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अध्याय 7 · 30 श्लोक
ज्ञानविज्ञानयोगः

ज्ञानविज्ञानयोग

श्रीकृष्ण अपनी दिव्य प्रकृति (परा एवं अपरा प्रकृति) का वर्णन करते हैं तथा सभी वस्तुओं में अपने व्याप्त होने का उपदेश देते हैं।

इस अध्याय के लिए विस्तृत श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या अभी संपादकीय समीक्षा में है — शीघ्र जोड़ी जाएगी।

यहाँ दी गई "सरल व्याख्या" एवं "व्यावहारिक जीवन-शिक्षा" Sanatan Unity की अपनी सरलीकृत प्रस्तुति है — यह किसी विशिष्ट पारंपरिक भाष्य (जैसे शंकराचार्य/रामानुजाचार्य/मध्वाचार्य भाष्य) का प्रतिस्थापन नहीं है।
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