आत्मसंयमयोगः (ध्यानयोगः)
आत्मसंयमयोग
ध्यान-योग की विधि, मन के नियंत्रण की आवश्यकता एवं योग-साधना में संतुलित जीवनशैली (आहार-विहार) के महत्व का वर्णन।
श्लोक 19
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥
yathā dīpo nivāta-stho neṅgate sopamā smṛtā, yogino yata-cittasya yuñjato yogam ātmanaḥ
हिन्दी अनुवाद
जिस प्रकार वायुरहित स्थान में रखा दीपक हिलता (कंपित होता) नहीं — यही उपमा उस योगी के संयमित चित्त की दी गई है जो आत्म-योग में लीन है।
सरल व्याख्या
ध्यान की गहन एकाग्र अवस्था में मन की स्थिरता का सुंदर उपमा-चित्रण।
दार्शनिक अर्थ
ध्यान-योग में चित्त की एकाग्रता एवं स्थिरता का वर्णन।
व्यावहारिक जीवन-शिक्षा
ध्यान-अभ्यास में मन की स्थिरता के लक्ष्य को समझने हेतु एक पारंपरिक उपमा — यह ध्यान-संबंधी दावा है, चिकित्सकीय दावा नहीं (देखें /disclaimer)।
यहाँ दी गई "सरल व्याख्या" एवं "व्यावहारिक जीवन-शिक्षा" Sanatan Unity की अपनी सरलीकृत प्रस्तुति है — यह किसी विशिष्ट पारंपरिक भाष्य (जैसे शंकराचार्य/रामानुजाचार्य/मध्वाचार्य भाष्य) का प्रतिस्थापन नहीं है।