होम सनातन ज्ञान ग्रंथ वेद उपनिषद पुराण भगवद्गीता ऋषि एवं आचार्य देवता पवित्र स्थान विज्ञान एवं प्राचीन ज्ञान प्राचीन तकनीक दर्शन आध्यात्म एवं चेतना मंत्र एवं साधना पूजा विधि कर्म पुनर्जन्म 84 लाख योनियाँ असुर एवं अन्य लोक कहानियाँ पर्व और त्योहार आध्यात्मिक मार्गदर्शन खोजें संपर्क करें JOIN SANATAN
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18
अध्याय 6 · 47 श्लोक
आत्मसंयमयोगः (ध्यानयोगः)

आत्मसंयमयोग

ध्यान-योग की विधि, मन के नियंत्रण की आवश्यकता एवं योग-साधना में संतुलित जीवनशैली (आहार-विहार) के महत्व का वर्णन।

श्लोक 19
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥
yathā dīpo nivāta-stho neṅgate sopamā smṛtā, yogino yata-cittasya yuñjato yogam ātmanaḥ
हिन्दी अनुवाद

जिस प्रकार वायुरहित स्थान में रखा दीपक हिलता (कंपित होता) नहीं — यही उपमा उस योगी के संयमित चित्त की दी गई है जो आत्म-योग में लीन है।

सरल व्याख्या

ध्यान की गहन एकाग्र अवस्था में मन की स्थिरता का सुंदर उपमा-चित्रण।

दार्शनिक अर्थ

ध्यान-योग में चित्त की एकाग्रता एवं स्थिरता का वर्णन।

व्यावहारिक जीवन-शिक्षा

ध्यान-अभ्यास में मन की स्थिरता के लक्ष्य को समझने हेतु एक पारंपरिक उपमा — यह ध्यान-संबंधी दावा है, चिकित्सकीय दावा नहीं (देखें /disclaimer)।

यहाँ दी गई "सरल व्याख्या" एवं "व्यावहारिक जीवन-शिक्षा" Sanatan Unity की अपनी सरलीकृत प्रस्तुति है — यह किसी विशिष्ट पारंपरिक भाष्य (जैसे शंकराचार्य/रामानुजाचार्य/मध्वाचार्य भाष्य) का प्रतिस्थापन नहीं है।
← अध्याय 5 अध्याय 7 →