ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
श्रीकृष्ण अपने अवतार-रहस्य (धर्म-संस्थापना हेतु युग-युग में अवतरण) एवं कर्म-अकर्म के सूक्ष्म भेद को स्पष्ट करते हैं; ज्ञान की महिमा का वर्णन।
हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को रचता (अवतरित करता) हूँ।
यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है — ईश्वर के अवतार लेने का प्रयोजन बताता है।
अवतारवाद का सिद्धांत — धर्म-संस्थापना हेतु ईश्वर का समय-समय पर अवतरण।
नैतिक/सामाजिक पतन के समय आशा एवं सुधार की संभावना के प्रतीक के रूप में लोकप्रिय रूप से उद्धृत।
साधु-जनों की रक्षा हेतु, दुष्कर्मियों के विनाश हेतु तथा धर्म की स्थापना हेतु मैं युग-युग में जन्म लेता हूँ।
पिछले श्लोक (4.7) की निरंतरता — अवतार के तीन प्रयोजन स्पष्ट करता है।
अवतारवाद सिद्धांत का विस्तार — धर्म-रक्षा एक चक्रीय, आवर्ती प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत।
न्याय एवं धर्म की अंततः पुनर्स्थापना में विश्वास के प्रतीक के रूप में उद्धृत।