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अध्याय 2 · 72 श्लोक
सांख्ययोगः

सांख्ययोग

श्रीकृष्ण अर्जुन के शोक को अज्ञान बताते हुए आत्मा की अमरता, कर्तव्य-पालन के महत्व एवं निष्काम कर्म के सिद्धांत का परिचय देते हैं — गीता के केंद्रीय दार्शनिक विचारों का प्रारंभिक सार।

श्लोक 20
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
na jāyate mriyate vā kadācin nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ, ajo nityaḥ śāśvato'yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre
हिन्दी अनुवाद

यह आत्मा न कभी जन्म लेता है, न कभी मरता है; यह न कभी उत्पन्न हुआ है और न ही भविष्य में उत्पन्न होगा। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत एवं पुरातन है — शरीर के मारे जाने पर भी यह मारा नहीं जाता।

सरल व्याख्या

आत्मा शरीर से भिन्न है और शरीर की मृत्यु से आत्मा का अंत नहीं होता — यह गीता के केंद्रीय दार्शनिक कथनों में से एक है।

दार्शनिक अर्थ

यह श्लोक आत्मा की नित्यता (शाश्वतता) का सांख्य-वेदांत-सम्मत सिद्धांत प्रस्तुत करता है — शरीर परिवर्तनशील है, आत्मा अपरिवर्तनशील।

व्यावहारिक जीवन-शिक्षा

मृत्यु के भय एवं शोक को समझने हेतु एक दार्शनिक दृष्टिकोण — परंतु यह चिकित्सकीय शोक-प्रबंधन का विकल्प नहीं है (देखें /disclaimer)।

श्लोक 47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣu kadācana, mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo'stv akarmaṇi
हिन्दी अनुवाद

तेरा अधिकार केवल कर्म (करने) में है, उसके फलों में कभी नहीं। तू कर्मफल का हेतु मत बन, और न ही तेरी अकर्म (कर्म न करने) में आसक्ति हो।

सरल व्याख्या

यह गीता का सर्वाधिक उद्धृत श्लोक है — अपना कर्तव्य निभाओ, परिणाम की चिंता किए बिना।

दार्शनिक अर्थ

निष्काम कर्म (फलासक्ति-रहित कर्म) का सिद्धांत — कर्मयोग का केंद्रीय आधार।

व्यावहारिक जीवन-शिक्षा

कार्यस्थल एवं जीवन में परिणाम की अत्यधिक चिंता से उत्पन्न तनाव को कम करने हेतु एक दार्शनिक दृष्टिकोण के रूप में लोकप्रिय रूप से उद्धृत किया जाता है।

यहाँ दी गई "सरल व्याख्या" एवं "व्यावहारिक जीवन-शिक्षा" Sanatan Unity की अपनी सरलीकृत प्रस्तुति है — यह किसी विशिष्ट पारंपरिक भाष्य (जैसे शंकराचार्य/रामानुजाचार्य/मध्वाचार्य भाष्य) का प्रतिस्थापन नहीं है।
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