सांख्ययोग
श्रीकृष्ण अर्जुन के शोक को अज्ञान बताते हुए आत्मा की अमरता, कर्तव्य-पालन के महत्व एवं निष्काम कर्म के सिद्धांत का परिचय देते हैं — गीता के केंद्रीय दार्शनिक विचारों का प्रारंभिक सार।
यह आत्मा न कभी जन्म लेता है, न कभी मरता है; यह न कभी उत्पन्न हुआ है और न ही भविष्य में उत्पन्न होगा। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत एवं पुरातन है — शरीर के मारे जाने पर भी यह मारा नहीं जाता।
आत्मा शरीर से भिन्न है और शरीर की मृत्यु से आत्मा का अंत नहीं होता — यह गीता के केंद्रीय दार्शनिक कथनों में से एक है।
यह श्लोक आत्मा की नित्यता (शाश्वतता) का सांख्य-वेदांत-सम्मत सिद्धांत प्रस्तुत करता है — शरीर परिवर्तनशील है, आत्मा अपरिवर्तनशील।
मृत्यु के भय एवं शोक को समझने हेतु एक दार्शनिक दृष्टिकोण — परंतु यह चिकित्सकीय शोक-प्रबंधन का विकल्प नहीं है (देखें /disclaimer)।
तेरा अधिकार केवल कर्म (करने) में है, उसके फलों में कभी नहीं। तू कर्मफल का हेतु मत बन, और न ही तेरी अकर्म (कर्म न करने) में आसक्ति हो।
यह गीता का सर्वाधिक उद्धृत श्लोक है — अपना कर्तव्य निभाओ, परिणाम की चिंता किए बिना।
निष्काम कर्म (फलासक्ति-रहित कर्म) का सिद्धांत — कर्मयोग का केंद्रीय आधार।
कार्यस्थल एवं जीवन में परिणाम की अत्यधिक चिंता से उत्पन्न तनाव को कम करने हेतु एक दार्शनिक दृष्टिकोण के रूप में लोकप्रिय रूप से उद्धृत किया जाता है।