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अध्याय 15 · 20 श्लोक
पुरुषोत्तमयोगः

पुरुषोत्तमयोग

संसार-वृक्ष का रूपक; क्षर (नश्वर) एवं अक्षर (अनश्वर) पुरुष से परे "पुरुषोत्तम" की अवधारणा।

श्लोक 7
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
mamaivāṁśo jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ, manaḥ-ṣaṣṭhānīndriyāṇi prakṛti-sthāni karṣati
हिन्दी अनुवाद

इस जीव-लोक में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है, जो प्रकृति में स्थित मन सहित छह इंद्रियों को अपनी ओर खींचता है।

सरल व्याख्या

जीवात्मा को परमात्मा का ही एक "अंश" बताया गया है — यह वेदांत के अद्वैत/विशिष्टाद्वैत विमर्श से जुड़ी एक केंद्रीय पंक्ति है।

दार्शनिक अर्थ

जीवात्मा-परमात्मा संबंध — दर्शन-परंपरा के अनुसार इसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न है (देखें /darshan पर अद्वैत/द्वैत/विशिष्टाद्वैत तुलना)।

व्यावहारिक जीवन-शिक्षा

आत्मा की ईश्वर से निकटता के भाव के रूप में भक्ति-परंपरा में उद्धृत।

यहाँ दी गई "सरल व्याख्या" एवं "व्यावहारिक जीवन-शिक्षा" Sanatan Unity की अपनी सरलीकृत प्रस्तुति है — यह किसी विशिष्ट पारंपरिक भाष्य (जैसे शंकराचार्य/रामानुजाचार्य/मध्वाचार्य भाष्य) का प्रतिस्थापन नहीं है।
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