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📜 ग्रंथ प्रमाण
ऋग्वेदसंहिता

ऋग्वेद

ऋग्वेद चारों वेदों में सबसे प्राचीन एवं भाषिक दृष्टि से सबसे मूल है। इसके सूक्त मुख्यतः अग्नि, इंद्र, वरुण, सोम जैसे देवताओं की स्तुति में रचित हैं, परंतु इसमें दार्शनिक चिंतन (जैसे नासदीय सूक्त — सृष्टि की उत्पत्ति पर प्रश्न) भी सम्मिलित है।

परंपरागत मत: परंपरा में वेदों को अनादि/अपौरुषेय (मानव-रचित नहीं) माना जाता है, जिन्हें ऋषियों ने ध्यान/तप के माध्यम से "दृष्ट" (साक्षात्कार) किया, रचा नहीं।
शैक्षणिक कालनिर्धारण: भाषावैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर विद्वान ऋग्वेद के मूल भाग की रचना को सामान्यतः ईसा-पूर्व लगभग 1500-1200 के आसपास (उत्तर-पश्चिम भारतीय उपमहाद्वीप में) रखते हैं — यह एक विद्वत अनुमान है, सर्वसम्मत सटीक तिथि नहीं।

संरचना

10 मण्डलों में विभक्त, कुल 1028 सूक्त (स्तोत्र), लगभग 10,600 मंत्र। मण्डल 2-7 को "वंश मण्डल" (पारिवारिक मण्डल) कहा जाता है, जो सबसे प्राचीन माने जाते हैं; मण्डल 1, 8, 10 अपेक्षाकृत परवर्ती संकलन माने जाते हैं।

प्रमुख मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
oṁ bhūr bhuvaḥ svaḥ tat savitur vareṇyaṁ bhargo devasya dhīmahi dhiyo yo naḥ pracodayāt
हिन्दी अर्थ

हम उस श्रेष्ठ, तेजस्वी सविता (सूर्य) देव का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।

सरल व्याख्या

गायत्री मंत्र — वैदिक परंपरा का सर्वाधिक पवित्र एवं व्यापक रूप से जपा जाने वाला मंत्र, सविता (सूर्य) देवता को समर्पित।

संदर्भ: 3.62.10