शबरी के बेर
वाल्मीकि रामायण एवं रामचरितमानस के अनुसार, वनवास के दौरान श्रीराम एवं लक्ष्मण मातंग ऋषि के आश्रम में भक्तिन शबरी से मिले। शबरी ने अपने गुरु के आदेशानुसार वर्षों तक राम की प्रतीक्षा की थी। उन्होंने राम को अपने द्वारा चखे हुए (जूठे) बेर खिलाए, यह देखते हुए कि केवल मीठे बेर ही राम को अर्पित किए जाएँ — राम ने बिना किसी भेदभाव के प्रेमपूर्वक वे बेर ग्रहण किए।
अर्थ
यह कथा भक्ति में सामाजिक स्थिति एवं औपचारिकता से ऊपर, शुद्ध भाव के महत्व को दर्शाती है।
नैतिक शिक्षा
सच्ची भक्ति एवं प्रेम में जाति, स्थिति या औपचारिकता का कोई स्थान नहीं — भाव की शुद्धता ही सर्वोपरि है।
भिन्न संस्करण: यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड में तथा रामचरितमानस में विस्तार से वर्णित है; तुलसीदास के वर्णन में भावनात्मक विस्तार अधिक है।