समुद्र मंथन
विष्णु पुराण एवं भागवत पुराण के अनुसार, देवताओं एवं असुरों ने अमृत प्राप्ति हेतु मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया — मंदराचल पर्वत को मथनी एवं वासुकि नाग को रस्सी बनाकर। मंथन से क्रमशः हलाहल विष (जिसे शिव ने पिया), कामधेनु, ऐरावत, कल्पवृक्ष, लक्ष्मी, तथा अंततः धन्वंतरि द्वारा अमृत-कलश सहित अनेक रत्न प्रकट हुए। अमृत को लेकर देवासुर संग्राम भी हुआ, जिसमें विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत का वितरण देवताओं में ही सुनिश्चित किया।
अर्थ
यह कथा सृष्टि में अच्छाई-बुराई (देव-असुर) के सहयोग एवं संघर्ष दोनों से ही मूल्यवान वस्तुओं के प्रकट होने का प्रतीकात्मक वर्णन है।
नैतिक शिक्षा
महान उपलब्धियाँ प्रायः कठिन प्रयास (मंथन) एवं विरोधी शक्तियों के बीच संतुलन से प्राप्त होती हैं — तथा विष (कठिनाई) को भी स्वीकार करने का साहस आवश्यक है।
भिन्न संस्करण: यह कथा विष्णु पुराण, भागवत पुराण एवं महाभारत — तीनों में वर्णित है, विवरण के छोटे-छोटे बिंदुओं में भिन्नता के साथ।