कर्ण का दान
महाभारत के अनुसार, कर्ण अपनी असाधारण दानशीलता हेतु प्रसिद्ध थे — प्रतिदिन सूर्य-उपासना के पश्चात जो भी याचक कुछ माँगता, कर्ण उसे कभी खाली हाथ नहीं लौटाते थे। कथा के अनुसार, इंद्र ने ब्राह्मण का वेश धारण कर कर्ण से उनके जन्मजात कवच-कुंडल (जो उन्हें अजेय बनाते थे) माँगे। कर्ण को इंद्र की वास्तविक पहचान का ज्ञान होते हुए भी उन्होंने अपने दान-व्रत का पालन करते हुए कवच-कुंडल दान कर दिए।
अर्थ
यह कथा कर्ण के चरित्र की जटिलता एवं उदारता के उच्चतम आदर्श को दर्शाती है।
नैतिक शिक्षा
सच्चा दान वह है जो परिणाम जानते हुए भी, बिना शर्त के दिया जाए — सिद्धांतों पर अडिग रहना, चाहे व्यक्तिगत मूल्य कितना भी बड़ा हो।
भिन्न संस्करण: महाभारत के वन पर्व में यह प्रसंग विस्तार से वर्णित है — कर्ण के चरित्र-चित्रण में कवियों एवं परवर्ती पुनर्कथनों में भावनात्मक व्याख्या में भिन्नता पाई जाती है।