नागार्जुन
नागार्जुन
काल (परंपरागत): लगभग द्वितीय–तृतीय शताब्दी ई. (बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन) · परंपरा: बौद्ध मध्यमक दर्शन (सनातन परंपरा से संवाद में प्रासंगिक)
नागार्जुन बौद्ध मध्यमक दर्शन के प्रवर्तक माने जाते हैं, जिनकी "शून्यता" (Śūnyatā) की अवधारणा भारतीय दार्शनिक चिंतन के इतिहास में अत्यंत प्रभावशाली रही है।
शैक्षणिक कालनिर्धारण-टिप्पणी: ध्यान दें: "नागार्जुन" नाम से एक बौद्ध मध्यमक दार्शनिक तथा एक भिन्न रसायन/आयुर्वेद-संबंधी परवर्ती व्यक्तित्व — दोनों परंपरा में मिलते हैं, और इन्हें प्रायः परस्पर मिला दिया जाता है। यह प्रविष्टि मुख्यतः दार्शनिक नागार्जुन को संदर्भित करती है।
योगदान
भारतीय दार्शनिक परंपराओं (वैदिक एवं बौद्ध) के बीच के अंतर्संवाद को समझने हेतु महत्वपूर्ण व्यक्तित्व।
शिक्षाएँ
शून्यता एवं प्रतीत्यसमुत्पाद (आश्रित उत्पत्ति) का दार्शनिक विश्लेषण।
संबंधित ग्रंथ
मूलमध्यमककारिका