आरती विधि
दीपक की ज्योति के माध्यम से देवता के समक्ष श्रद्धा-निवेदन एवं पूजा का समापन।
आवश्यक सामग्री
घी/तेल का दीपक (आरती हेतु विशेष आरती-स्टैंड), घंटी।
विधि (चरण)
1. आरती-दीपक प्रज्ज्वलित करना। 2. घंटी बजाते हुए देवता के समक्ष दीपक को वृत्ताकार गति में घुमाना (सामान्यतः चरणों से आरंभ कर मुख तक, दक्षिणावर्त)। 3. आरती-गीत/स्तोत्र का गायन। 4. आरती की ज्योति को भक्तों में अर्पित करना (हाथों से ग्रहण कर माथे से स्पर्श करना)।
प्रयुक्त मंत्र
इष्ट-देवता की आरती (जैसे "ॐ जय जगदीश हरे" — विष्णु हेतु; "जय शिव ओंकारा" — शिव हेतु)।
परंपरागत अर्थ
ज्योति को ईश्वर के दिव्य तेज एवं अज्ञान-नाश के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
क्षेत्रीय भिन्नताएँ: आरती-गीत एवं विधि का विस्तार क्षेत्र-अनुसार भिन्न होता है।
यह विधि एक सामान्य/व्यापक रूप से प्रचलित रूपरेखा है — यह किसी विशेष सम्प्रदाय/परिवार-परंपरा की एकमात्र "सही" विधि होने का दावा नहीं करती।