वेदान्त
वेदांत दर्शन (उत्तर मीमांसा)
वेदांत दर्शन उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र एवं भगवद्गीता ("प्रस्थानत्रयी") पर आधारित है, तथा ब्रह्म (परम सत्य), आत्मा एवं जगत के पारस्परिक संबंध की व्याख्या करता है। वेदांत के भीतर ही अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत जैसी कई उप-परंपराएँ विकसित हुईं, जो इस संबंध की भिन्न-भिन्न व्याख्या करती हैं।
पाठ्य आधार
उपनिषद, ब्रह्मसूत्र (बादरायण), भगवद्गीता
प्रमुख चिंतक
आदि शंकराचार्य (अद्वैत), रामानुजाचार्य (विशिष्टाद्वैत), मध्वाचार्य (द्वैत)
आत्मा/स्वयं की अवधारणा
देखें tradition_comparison — अद्वैत, विशिष्टाद्वैत एवं द्वैत में आत्मा-ब्रह्म संबंध की व्याख्या भिन्न-भिन्न है।
यथार्थ की अवधारणा
ब्रह्म ही परम सत्य है — परंतु ब्रह्म-जगत-आत्मा के संबंध की प्रकृति पर उप-परंपराओं में मतभेद है।
मोक्ष का मार्ग
ब्रह्म-ज्ञान (अद्वैत में) या ईश्वर के प्रति भक्ति/शरणागति (विशिष्टाद्वैत/द्वैत में) के माध्यम से मोक्ष।
विभिन्न परंपराओं में व्याख्या-भेद: ### अद्वैत वेदांत (शंकराचार्य): आत्मा एवं ब्रह्म पूर्णतः अभिन्न हैं ("ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या") — जगत की भिन्नता माया (आभासी अज्ञान) के कारण प्रतीत होती है।
### विशिष्टाद्वैत (रामानुजाचार्य): ब्रह्म (ईश्वर) एवं जीवात्मा-जगत के बीच "गुण-विशिष्ट अभेद" है — जीव एवं जगत ब्रह्म के ही शरीर/अंग हैं, परंतु पूर्णतः अभिन्न नहीं।
### द्वैत (मध्वाचार्य): ईश्वर, जीवात्मा एवं जड़ जगत — तीनों सदैव वास्तविक रूप से पृथक (भिन्न) रहते हैं, कभी अभिन्न नहीं होते।
### विशिष्टाद्वैत (रामानुजाचार्य): ब्रह्म (ईश्वर) एवं जीवात्मा-जगत के बीच "गुण-विशिष्ट अभेद" है — जीव एवं जगत ब्रह्म के ही शरीर/अंग हैं, परंतु पूर्णतः अभिन्न नहीं।
### द्वैत (मध्वाचार्य): ईश्वर, जीवात्मा एवं जड़ जगत — तीनों सदैव वास्तविक रूप से पृथक (भिन्न) रहते हैं, कभी अभिन्न नहीं होते।