सांख्य
सांख्य दर्शन
सांख्य दर्शन पुरुष (शुद्ध चेतना) एवं प्रकृति (जड़ तत्त्व) के द्वैतवाद पर आधारित है — सृष्टि की समस्त विविधता प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस) के परस्पर संतुलन-असंतुलन से उत्पन्न मानी जाती है।
पाठ्य आधार
सांख्यकारिका (ईश्वरकृष्ण), सांख्यसूत्र (परंपरागत रूप से कपिल से संबद्ध)
प्रमुख चिंतक
महर्षि कपिल, ईश्वरकृष्ण
आत्मा/स्वयं की अवधारणा
पुरुष — शुद्ध, निष्क्रिय, साक्षी चेतना, जो प्रकृति से पूर्णतः भिन्न है।
यथार्थ की अवधारणा
द्वैतवाद — पुरुष एवं प्रकृति दोनों स्वतंत्र, वास्तविक तत्त्व हैं (शास्त्रीय सांख्य में ईश्वर की कोई स्पष्ट भूमिका नहीं है, जो इसे अन्य दर्शनों से अलग करता है)।
मोक्ष का मार्ग
पुरुष का प्रकृति से पूर्ण विवेक (भेद-ज्ञान) ही मोक्ष (कैवल्य) है।
विभिन्न परंपराओं में व्याख्या-भेद: योग दर्शन सांख्य के तत्त्व-सिद्धांत (25 तत्त्व) को स्वीकार करता है, परंतु इसमें एक अतिरिक्त तत्त्व — ईश्वर — को भी स्थान देता है, जो शास्त्रीय सांख्य से एक उल्लेखनीय अंतर है।