पूर्व मीमांसा
पूर्व मीमांसा दर्शन
पूर्व मीमांसा दर्शन वैदिक कर्मकाण्ड (यज्ञ-विधियों) की व्याख्या एवं शब्द-प्रामाण्य (वेद-वाक्यों की स्वतःसिद्ध प्रामाणिकता) पर केंद्रित है।
पाठ्य आधार
मीमांसासूत्र (जैमिनि)
प्रमुख चिंतक
महर्षि जैमिनि, कुमारिल भट्ट, प्रभाकर (भाष्यकार)
आत्मा/स्वयं की अवधारणा
आत्मा को कर्म-फल का भोक्ता, नित्य द्रव्य के रूप में स्वीकार करता है।
यथार्थ की अवधारणा
वेद-वाक्यों को अपौरुषेय (मानव-रचित नहीं) एवं स्वतः-प्रामाणिक माना जाता है — यह दर्शन ईश्वर की सृष्टि-कर्ता भूमिका पर बहुत बल नहीं देता, कर्मकाण्ड के स्वतःसिद्ध प्रभाव पर अधिक केंद्रित है।
मोक्ष का मार्ग
यज्ञ-कर्मों के सम्यक अनुष्ठान से धर्म-पालन एवं स्वर्ग-प्राप्ति (परवर्ती व्याख्याओं में मोक्ष की चर्चा भी जुड़ी)।
विभिन्न परंपराओं में व्याख्या-भेद: पूर्व मीमांसा एवं उत्तर मीमांसा (वेदांत) दोनों वेदों को प्रमाण मानते हैं, परंतु मीमांसा कर्मकाण्ड (यज्ञ) पर केंद्रित है जबकि वेदांत ज्ञानकाण्ड (उपनिषदों) पर।