पुनर्जन्मन्
पुनर्जन्म
पुनर्जन्म की अवधारणा के अनुसार आत्मा मृत्यु के पश्चात अपने संचित कर्मों के अनुसार एक नए शरीर में जन्म लेती है — यह चक्र (संसार) तब तक चलता रहता है जब तक मोक्ष प्राप्त न हो जाए।
पाठ्य आधार
भगवद्गीता 2.22 ("वासांसि जीर्णानि यथा विहाय..."), उपनिषद, पुराण
प्रमुख चिंतक
वेदांत, योग एवं सांख्य — लगभग सभी परंपराओं में स्वीकृत, यद्यपि इसकी क्रियाविधि की व्याख्या भिन्न है।
विभिन्न परंपराओं में व्याख्या-भेद: ### ग्रंथों में यह अवधारणा मिलती है, इसे वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता — यह एक परंपरागत/दार्शनिक विश्वास है (देखें /karma-and-punarjanma पृष्ठ हेतु विस्तृत विवेचन तथा वैज्ञानिक स्थिति)।
विभिन्न परंपराओं में पुनर्जन्म के "उद्देश्य" की व्याख्या भिन्न है — अद्वैत वेदांत में इसे अंततः मिथ्या (मायिक) मानते हुए भी व्यावहारिक स्तर पर स्वीकार किया जाता है, जबकि भक्ति-परंपराओं में यह ईश्वर-कृपा से मुक्ति की प्रतीक्षा की एक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है।
विभिन्न परंपराओं में पुनर्जन्म के "उद्देश्य" की व्याख्या भिन्न है — अद्वैत वेदांत में इसे अंततः मिथ्या (मायिक) मानते हुए भी व्यावहारिक स्तर पर स्वीकार किया जाता है, जबकि भक्ति-परंपराओं में यह ईश्वर-कृपा से मुक्ति की प्रतीक्षा की एक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है।