न्याय
न्याय दर्शन
न्याय दर्शन तर्कशास्त्र (Logic) एवं ज्ञानमीमांसा (Epistemology) पर केंद्रित है — यह मुख्य रूप से यह प्रश्न पूछता है कि हम किसी बात को "सत्य" कैसे जान सकते हैं, तथा वैध तर्क की संरचना क्या है।
पाठ्य आधार
न्यायसूत्र (अक्षपाद गौतम)
प्रमुख चिंतक
अक्षपाद गौतम, वात्स्यायन (भाष्यकार)
आत्मा/स्वयं की अवधारणा
आत्मा को द्रव्य (substance) के रूप में स्वीकार किया गया है, जो ज्ञान, इच्छा एवं प्रयत्न का आधार है।
यथार्थ की अवधारणा
वस्तुनिष्ठ यथार्थवाद (Realism) — बाह्य जगत मन से स्वतंत्र वास्तविक रूप से विद्यमान है।
मोक्ष का मार्ग
मिथ्या ज्ञान के नाश एवं सम्यक ज्ञान की प्राप्ति से दुःख-निवृत्ति (मोक्ष) संभव है।
विभिन्न परंपराओं में व्याख्या-भेद: न्याय एवं वैशेषिक कालांतर में "न्याय-वैशेषिक" के रूप में एक संयुक्त परंपरा में विलीन हो गए, क्योंकि दोनों की तत्त्व-मीमांसा (metaphysics) एवं ज्ञानमीमांसा परस्पर पूरक पाई गईं।