सनातन ग्रंथों में कुछ अवधारणाएँ ऐसी हैं जो अत्यंत गहन, अमूर्त तथा आधुनिक पाठक के लिए रहस्यमय प्रतीत होती हैं — जैसे सूक्ष्म शरीर (स्थूल शरीर से भिन्न, मन-प्राण से बना एक सूक्ष्मतर आवरण), समय की चक्रीय अवधारणा (कल्प-युग — देखें /science-comparison पर विस्तृत सावधानी-पूर्ण चर्चा), नाद (मूल ध्वनि-तत्त्व, जिससे सृष्टि की उत्पत्ति मानी जाती है), तथा आकाश (पंचमहाभूतों में सबसे सूक्ष्म तत्त्व, जिसे केवल "आकाश/स्पेस" के भौतिक अर्थ तक सीमित समझना अधूरा होगा — दार्शनिक अर्थ में यह ध्वनि का माध्यम एवं सूक्ष्मतम तत्त्व माना जाता है)।

समाधि एवं ध्यान की गहन अवस्थाओं का वर्णन भी इसी श्रेणी में आता है — योगसूत्र में समाधि की सूक्ष्म अवस्थाओं का विस्तृत वर्गीकरण मिलता है, जिनका आधुनिक विज्ञान की भाषा में सीधा अनुवाद कठिन है।

यह पृष्ठ जानबूझकर इन विषयों को "विज्ञान ने सिद्ध कर दिया" के बजाय "ग्रंथों में यह अवधारणा मिलती है, इसकी दार्शनिक व्याख्या यह है" के रूप में प्रस्तुत करता है — पाठकों को स्वयं इनका अन्वेषण करने हेतु आमंत्रित करते हुए, बिना अतिशयोक्तिपूर्ण दावों के।