सनातन परंपरा में मानव-चेतना को केवल मस्तिष्क की गतिविधि तक सीमित नहीं, अपितु एक विस्तार-योग्य, प्रशिक्षण-योग्य क्षमता के रूप में देखा जाता है — ध्यान, समाधि, प्राणायाम, नाम-जप, धारणा, प्रत्याहार, योग एवं तपस्या (देखें /spiritual-practices) — इन सभी अभ्यासों को चेतना के विस्तार अथवा शुद्धिकरण के साधन के रूप में वर्णित किया जाता है।
आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान में ध्यान-अभ्यासियों पर कुछ अध्ययन हुए हैं, जो मस्तिष्क-तरंगों एवं ध्यान-अवस्था के बीच सहसंबंध दर्शाते हैं — परंतु "सहसंबंध" एवं "परंपरा में वर्णित आध्यात्मिक अनुभव की पूर्ण वैज्ञानिक व्याख्या" में अंतर समझना आवश्यक है। वर्तमान वैज्ञानिक समझ ध्यान के कुछ मापने-योग्य शारीरिक/मानसिक प्रभावों तक सीमित है, यह परंपरा में वर्णित सभी दावों (जैसे सिद्धियों की प्राप्ति) की पुष्टि नहीं करती।
यह पृष्ठ दोनों दृष्टिकोणों — परंपरागत आध्यात्मिक व्याख्या एवं वर्तमान वैज्ञानिक समझ की सीमाएँ — को साथ-साथ, बिना किसी को दूसरे पर थोपे, प्रस्तुत करता है।