भारतीय ज्योतिष परंपरागत रूप से दो भागों में विभाजित है: सिद्धांत/गणित ज्योतिष (खगोलीय पिंडों की स्थिति की गणितीय गणना — जिसमें आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य जैसे गणितज्ञों का महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक रूप से सुस्थापित योगदान है), तथा फलित ज्योतिष (ग्रहों की स्थिति के आधार पर मानव-जीवन की घटनाओं की भविष्यवाणी)।
यह भेद समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है: गणितीय खगोल-गणना (ग्रहों/नक्षत्रों की स्थिति की गणना) एक सुस्थापित गणितीय परंपरा है, जिसकी ऐतिहासिक उपलब्धियाँ प्रलेखित हैं (देखें /ancient-science पर आर्यभट-ब्रह्मगुप्त का योगदान)। इसके विपरीत, फलित ज्योतिष (कि ग्रहों की स्थिति मानव-जीवन की घटनाओं को प्रभावित करती है) एक परंपरागत विश्वास-प्रणाली है, जिसकी भविष्यवाणी-क्षमता का आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति द्वारा सुसंगत, दोहराने-योग्य प्रमाण उपलब्ध नहीं है — इसे इस वेबसाइट पर एक परंपरागत सांस्कृतिक/धार्मिक प्रथा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भविष्यवाणी-प्रणाली के रूप में नहीं।