आध्यात्म शब्द संस्कृत के "अधि" + "आत्मन्" से बना है, जिसका अर्थ है "आत्मा से संबंधित" अथवा "आत्मा की ओर उन्मुख।" यह भौतिक जगत की सीमाओं से परे, अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) एवं परम सत्य (ब्रह्म) को समझने के प्रयास को संदर्भित करता है।
सनातन परंपरा में आध्यात्मिक उन्नति हेतु मुख्यतः तीन मार्ग वर्णित हैं — भगवद्गीता में इन्हें विस्तार से प्रस्तुत किया गया है: ज्ञान योग (विवेक एवं आत्म-चिंतन के माध्यम से), भक्ति योग (ईश्वर के प्रति प्रेम एवं समर्पण के माध्यम से), तथा कर्म योग (निष्काम कर्म — फल की आसक्ति के बिना कर्तव्य-पालन के माध्यम से)। इनके अतिरिक्त पतंजलि का अष्टांग योग (राज योग) मन के नियंत्रण के माध्यम से एक व्यवस्थित पद्धति प्रस्तुत करता है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि विभिन्न व्यक्तियों एवं परंपराओं के लिए इनमें से किसी एक अथवा एकाधिक मार्गों का समन्वय उपयुक्त हो सकता है — गीता स्वयं यह स्वीकार करती है कि सभी का स्वभाव समान नहीं होता, अतः मार्ग भी भिन्न हो सकते हैं।