यक्ष
स्रोत: पुराण, कालिदास का "मेघदूत"
यक्ष धन एवं प्रकृति से संबद्ध अर्ध-दिव्य प्राणी माने जाते हैं, जिनके अधिपति कुबेर (धन के देवता) हैं। कालिदास के "मेघदूत" काव्य में एक यक्ष के विरह-वर्णन ने इस वर्ग को संस्कृत साहित्य में विशेष काव्यात्मक प्रतिष्ठा दी।
विशेषताएँ
धन-संपदा से संबद्ध, प्रकृति (वृक्ष, जलाशय) के रक्षक के रूप में भी वर्णित।
प्रसिद्ध कथाएँ
यक्ष-प्रश्न (महाभारत में युधिष्ठिर से यक्ष द्वारा पूछे गए प्रसिद्ध दार्शनिक प्रश्न — वस्तुतः यह यक्ष रूप में स्वयं धर्मराज थे)।
परंपरा के अनुसार स्वभाव
सामान्यतः तटस्थ अथवा सहायक प्रकृति के, यद्यपि कुछ कथाओं में मायावी रूप में भी वर्णित।
रक्षा-परंपराएँ
विशेष सुरक्षा-परंपरा का उल्लेख सीमित है — यक्ष सामान्यतः भय का नहीं, सम्मान का विषय हैं।
यह विवरण पौराणिक/लोक-परंपरा पर आधारित है — यह किसी वास्तविक, भौतिक रूप से मनुष्य को हानि पहुँचाने वाले प्राणी के अस्तित्व का वैज्ञानिक दावा नहीं है।