प्राचीन एवं मध्यकालीन भारतीय वास्तुकला ने मंदिर-निर्माण में अत्यंत उन्नत ज्यामितीय एवं संरचनात्मक कौशल का प्रदर्शन किया — नागर, द्रविड़ एवं वेसर — तीन प्रमुख मंदिर-स्थापत्य शैलियाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विकसित हुईं। कोणार्क का सूर्य मंदिर (13वीं शताब्दी, ओडिशा — यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल) अपने विशाल रथ-रूपी संरचना एवं पत्थर के पहियों की सटीक खगोलीय/ज्यामितीय संरचना हेतु विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

बृहदेश्वर मंदिर (तंजावुर, 11वीं शताब्दी चोल-निर्मित) अपने विशाल शिखर एवं तत्कालीन निर्माण-तकनीक (भारी पत्थरों को ऊँचाई तक ले जाने की विधि, जिस पर विद्वानों में विभिन्न मत हैं) हेतु शोध का विषय रहा है। ये संरचनाएँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित हैं तथा इनका स्थापत्य-विश्लेषण एक सक्रिय अकादमिक क्षेत्र है।