भारतीय गणित की परंपरा वैदिक काल की वेदांग ज्योतिष एवं शुल्ब सूत्रों (यज्ञ-वेदी निर्माण हेतु ज्यामितीय गणना) से आरंभ होकर आर्यभट, ब्रह्मगुप्त एवं भास्कराचार्य जैसे गणितज्ञों के माध्यम से अपने चरम पर पहुँची।
इस परंपरा के सर्वाधिक व्यापक रूप से मान्यता-प्राप्त योगदान हैं: शून्य को एक स्वतंत्र संख्या के रूप में स्थापित करना एवं इसके गणितीय नियम (ब्रह्मगुप्त, 628 ई.), दशमलव स्थानमान अंक-पद्धति (जो आज विश्वभर में प्रयुक्त होती है), आर्यभट द्वारा ज्या (sine) सारणी एवं π का सन्निकट मान, तथा भास्कराचार्य की "चक्रवाल पद्धति" (द्विघात अनिश्चित समीकरणों के हल हेतु)।
ये सभी योगदान गणित-इतिहास की मान्यता-प्राप्त अकादमिक कृतियों (जैसे कीम प्लोफ़कर की "Mathematics in India") में प्रलेखित हैं — इन्हें "समानता" के रूप में नहीं, अपितु प्रत्यक्ष ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। देखें /science पर "शून्य एवं दशमलव स्थानमान पद्धति" पृष्ठ हेतु विस्तृत विवरण।